Wednesday, February 11, 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ६ ,फरबरी २०१५ में


प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ६  ,फरबरी  २०१५ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 

 
 

  ग़ज़ल (जीबन एक बुलबुला )

गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते
जबानी जब  कदम चूमे बचपन छूट जाता है

बंगला  ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में
सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है

जबानी के नशें में लोग  क्या क्या ना किया करते
ढलते ही जबानी के  बुढ़ापा टूट जाता है

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है
समय को गर नहीं समझे  समय फिर रूठ जाता है

जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये
मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है



मदन मोहन सक्सेना

Thursday, January 8, 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ५ ,जनबरी २०१५ में


प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय  ,बर्ष -१  , अंक ५   ,जनबरी  २०१५  में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 


जिंदगी जिंदगी

तुझे पा लिया है जग पा लिया है
अब दिल में समाने लगी जिंदगी है

कभी गर्दिशों की कहानी लगी थी
मगर आज भाने लगी जिंदगी है

समय कैसे जाता समझ मैं ना पाता
अब समय को चुराने लगी जिंदगी है

कभी ख्बाब में तू हमारे थी आती
अब सपने सजाने लगी जिंदगी है

तेरे प्यार का ये असर हो गया है
अब मिलने मिलाने लगी जिंदगी है

मैं खुद को भुलाता, तू खुद को भुलाती
अब खुद को भुलाने लगी जिंदगी है


मदन मोहन सक्सेना

Thursday, December 18, 2014

मेरी पोस्ट " जिंदगी जिंदगी" ओपन बुक्स ऑनलाइन वेव साईट में







प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट  " जिंदगी जिंदगी " ओपन बुक्स ऑनलाइन    वेव साईट में शामिल की गयी है।  आप सब अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं करायें। लिंक नीचे दिया गया है।

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 जिंदगी जिंदगी

तुझे पा लिया है जग पा लिया है
अब दिल में समाने लगी जिंदगी है

कभी गर्दिशों की कहानी लगी थी
मगर आज भाने लगी जिंदगी है

समय कैसे जाता समझ मैं ना पाता
अब समय को चुराने लगी जिंदगी है

कभी ख्बाब में तू हमारे थी आती
अब सपने सजाने लगी जिंदगी है

तेरे प्यार का ये असर हो गया है
अब मिलने मिलाने लगी जिंदगी है

मैं खुद को भुलाता, तू खुद को भुलाती
अब खुद को भुलाने लगी जिंदगी है


मदन मोहन सक्सेना


मेरी पोस्ट " जिंदगी जिंदगी" ओपन बुक्स ऑनलाइन वेव साईट में

Monday, December 1, 2014

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक 3 ,दिसम्बर २०१४ में


 
 
 
 
 
प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय  ,बर्ष -१ , अंक 3  ,दिसम्बर   २०१४ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 





अपनी जिंदगी गुजारी है ख्बाबों के ही सायें में 
ख्बाबों  में तो अरमानों के जाने कितने मेले हैं  

भुला पायेंगें कैसे हम ,जिनके प्यार के खातिर
सूरज चाँद की माफिक हम दुनिया में अकेले हैं  

महकता है जहाँ सारा मुहब्बत की बदौलत ही
मुहब्बत को निभाने में फिर क्यों सारे झमेले हैं  

ये उसकी बदनसीबी गर ,नहीं तो और फिर क्या है
जिसने पाया है बहुत थोड़ा ज्यादा गम ही झेले हैं

अपनी जिंदगी गुजारी है ख्बाबों के ही सायें में
ख्बाबों  में तो अरमानों के जाने कितने मेले हैं  

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना
 

Sunday, November 9, 2014

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक २ ,नवम्बर २०१४ में

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक २  ,नवम्बर  २०१४ में

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय  ,बर्ष -१ , अंक २  ,नवम्बर  २०१४ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 
 



देखा जब नहीं उनको और हमने गीत नहीं गाया
जमाना हमसे ये बोला की बसंत माह क्यों नहीं आया

बसंत माह गुम हुआ कैसे ,क्या तुमको कुछ चला मालूम
कहा हमने ज़माने से कि हमको कुछ नहीं मालूम

पाकर के जिसे दिल में ,हुए हम खुद से बेगाने
उनका पास न आना ,ये हमसे तुम जरा पुछो

बसेरा जिनकी सूरत का हमेशा आँख में रहता
उनका न नजर आना, ये हमसे तुम जरा पूछो

जीवित  हैं  तो जीने का मजा सब लोग ले सकते
जीवित  रहके, मरने का मजा हमसे जरा पूछो

रोशन है जहाँ सारा मुहब्बत की बदौलत ही
अँधेरा दिन में दिख जाना ,ये हमसे तुम जरा पूछो

खुदा की बंदगी करके अपनी मन्नत पूरी सब करते
इबादत में सजा पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो

तमन्ना सबकी रहती है, की जन्नत उनको मिल जाए
जन्नत रस ना आना ये हमसे तुम जरा पूछो

साँसों  के जनाजें को, तो सबने जिंदगी जाना
दो पल की जिंदगी पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो



मदन मोहन सक्सेना

Thursday, October 9, 2014

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक १ , अक्टूबर २०१४ में

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय  ,बर्ष -१  , अंक १  , अक्टूबर  २०१४ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 
 
 गज़ल  (ये कैसा परिवार)

मेरे जिस टुकड़े को  दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,वह  सात समन्दर पार हुआ
   
रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा ,अब जाने क्या व्यवहार हुआ
 
दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ
 
मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है
युवा को अब काम नहीं है बचपन अब  बीमार हुआ

जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रैंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ

ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी  दूर हुएँ
अब हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ


ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Monday, September 1, 2014

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७ , सितम्बर २०१४ में


मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७    ,    सितम्बर २०१४  में

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७    , सितम्बर २०१४  में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .






 
किसको आज फुर्सत है किसी की बात सुनने की
अपने ख्बाबों और ख़यालों में सभी मशगूल दिखतें हैं

जीबन का सफ़र क्या क्या सबक सिखाता है यारों
मुश्किल में बहुत मुश्किल से अपने दोस्त दिखतें हैं

क्यों सच्ची और दिल की बात ख़बरों में नहीं दिखती
नहीं लेना हक़ीक़त से क्यों मन से आज लिखतें हैं

धर्म देखो कर्म देखो अब असर दिखता है पैसों का
भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं

सियासत में न इज्ज़त की,न मेहनत की कद्र यारों
सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं

दुनिया में जिधर देखो हज़ारों रास्ते दिखते हैं
मंजिल चाहे मिल जाए बस रास्ते नहीं मिलते हैं




मदन  मोहन  सक्सेना