Monday, September 1, 2014

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७ , सितम्बर २०१४ में


मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७    ,    सितम्बर २०१४  में

प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ७    , सितम्बर २०१४  में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .






 
किसको आज फुर्सत है किसी की बात सुनने की
अपने ख्बाबों और ख़यालों में सभी मशगूल दिखतें हैं

जीबन का सफ़र क्या क्या सबक सिखाता है यारों
मुश्किल में बहुत मुश्किल से अपने दोस्त दिखतें हैं

क्यों सच्ची और दिल की बात ख़बरों में नहीं दिखती
नहीं लेना हक़ीक़त से क्यों मन से आज लिखतें हैं

धर्म देखो कर्म देखो अब असर दिखता है पैसों का
भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं

सियासत में न इज्ज़त की,न मेहनत की कद्र यारों
सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं

दुनिया में जिधर देखो हज़ारों रास्ते दिखते हैं
मंजिल चाहे मिल जाए बस रास्ते नहीं मिलते हैं




मदन  मोहन  सक्सेना 



Friday, August 22, 2014

मेरी पोस्ट ग़ज़ल (फुर्सत में सियासत) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


मेरी पोस्ट ग़ज़ल (फुर्सत में सियासत) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में 





प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट
ग़ज़ल (फुर्सत में सियासत) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं। 
http://www.aapkablog.abplive.in/aapkablog/politics/2014/8/%E0%A4%AB%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%A4


 


किसको आज फुर्सत है किसी की बात सुनने की
अपने ख्बाबों और ख़यालों में सभी मशगूल दिखतें हैं


जीबन का सफ़र क्या क्या सबक सिखाता है यारों
मुश्किल में बहुत मुश्किल से अपने दोस्त दिखतें हैं


क्यों सच्ची और दिल की बात ख़बरों में नहीं दिखती
नहीं लेना हक़ीक़त से क्यों मन से आज लिखतें हैं


धर्म देखो कर्म देखो अब असर दिखता है पैसों का
भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं


सियासत में न इज्ज़त की,न मेहनत की कद्र यारों
सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं


दुनिया में जिधर देखो हज़ारों रास्ते दिखते हैं
मंजिल चाहे मिल जाए बस रास्ते नहीं मिलते हैं




ग़ज़ल: फुर्सत में सियासत

मदन  मोहन  सक्सेना



Wednesday, August 20, 2014

मेरी पोस्ट ग़ज़ल (जमीं से आसमाँ जाना किसे अच्छा नहीं लगता) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


मेरी पोस्ट ग़ज़ल (जमीं से आसमाँ जाना किसे अच्छा नहीं लगता) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट
ग़ज़ल (जमीं से आसमाँ जाना किसे अच्छा नहीं लगता)
आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं। 


http://aapkablog.abplive.in/aapkablog/other/2014/7/%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BE


 




जमीं से आसमाँ जाना किसे अच्छा नहीं लगता
चाह कर भी बुलन्दी पर कोई हमेशा रह नहीं सकता


जो दिल को रास ना आये हम ऐसे बोल क्यों बोलें
हर बात की एक सीमा है उससे ज्यादा कोई सह नहीं सकता


आवाज़ों की महफ़िल में दिल की बात दब जाती है
जुबां से दिल की बात को हर कोई कह नहीं सकता


कभी ख्बाबों में रहतें हैं कभी यादों में रहते हैं
समय के साथ दुनियां में यारों वह रह नहीं सकता


पाने की ख्वाहिश में हम क्या-क्या खो देते है
कहना भी अगर चाहें मगर कोई कह नहीं सकता


जमीं से आसमाँ जाना किसे अच्छा नहीं लगता
चाह कर भी बुलन्दी पर कोई हमेशा रह नहीं सकता



मदन मोहन सक्सेना

मेरी पोस्ट ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


मेरी पोस्ट
ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट
ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं। 



http://aapkablog.abplive.in/aapkablog/life-style/2014/8/%E0%A5%9A%E0%A5%9B%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2



 

 
 
 
 ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल)
 
कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना
जमीं भी हो गगन भी हो, ऐसा घर बनातें हैं

दीवारें ही दीवारें नजर आयें घरों में क्यों
पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है
टीवी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों
भूले से भी मेहमाँ को नहीं घर में टिकाते हैं

अब सन्नाटे के घेरे में ,जरुरत भर ही आवाजें
घर में दिल की बात, दिल में ही यारों अब दबातें हैं

 
 मदन मोहन सक्सेना
 

Wednesday, August 13, 2014

मेरी पोस्ट ग़ज़ल(खुद को रंग बदलते देखा) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में





मेरी पोस्ट ग़ज़ल(खुद को रंग  बदलते देखा) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट ग़ज़ल(खुद को रंग  बदलते देखा) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं। 



http://aapkablog.abplive.in/aapkablog/politics/2014/8/%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE 



 




ग़ज़ल(खुद को रंग  बदलते देखा)



सपनीली दुनियाँ में यारों सपनें खूब मचलते देखे
रंग बदलती दुनियाँ देखी खुद को रंग बदलते देखा

सुबिधाभोगी को एक जगह जमते देख़ा
भूखों और गरीबोँ को दर-दर भटकते देखा

देखा हर मौसम में मैनें अपने बच्चों को कठिनाई में
मैनें टॉमी, डॉगी, शेरू को, खाते देखा,पलते देखा

पैसों की ताकत के आगे गिरता हुआ ज़मीर देखा
कितना काम जरुरी हो पर उसको मैंने टलते देखा

रिश्तें नातें प्यार की बातें, इनको खूब सिसकते देखा
नए ज़माने के इस पल में, अपनों को भी छलते देखा


मदन मोहन सक्सेना


मेरी पोस्ट ग़ज़ल(समय वह और था यारों) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


मेरी पोस्ट ग़ज़ल(समय वह और था  यारों) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में




मेरी पोस्ट ग़ज़ल(समय वह और था  यारों) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट ग़ज़ल(समय वह और था  यारों) आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं। 




http://aapkablog.abplive.in/aapkablog/life-style/2014/7/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%B9-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82







समय वह और था यारों


अपने थे, समय भी था, समय वह और था यारों
अब समय पर भी नहीं अपने, मजबूरी का रेला है

हर इन्सां की दुनियाँ में इक जैसी कहानी है
तन्हा रहता है भीतर से, बाहर रिश्तों का मेला है

दिन कैसे दिखाती है पैसोँ की ललक देखों
तन्हा माँ-बाप घर में हैं, उधर बेटा अकेला है

रुपये पैसोँ की कीमत को वह ही जान सकता है
अपने बचपन में गरीबी का जिसने दंश झेला है

इधर ये दिल अकेला है, उधर तन्हा अकेली तुम
बहुत मुश्किल है ये कहना किसने खेल खेला है

जियो ऐसे कि हर इक पल, मानो आख़िरी पल है
हम आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है


मदन मोहन सक्सेना

Friday, August 8, 2014

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक २ , अगस्त २०१४ में


मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक २  , अगस्त  २०१४ में



प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक ६   , अगस्त २०१४  में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .





 



दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है
ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है


अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा
कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है


किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है
बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है


क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है


दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है
पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती है


भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें
"मदन " हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है




मदन मोहन सक्सेना