Sunday, June 21, 2015

१२ जून दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता में मेरे ब्लॉग अंश



१२ जून दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता में मेरे ब्लॉग अंश 

मदन मोहन सक्सेना

Monday, May 25, 2015

कबिता अनबरत १ में मेरी रचनाएँ

प्रिय मित्रों
मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी रचनाओं को "कबिता अनबरत " में स्थान दिया गया है।  संपादक श्रीमती चन्द्र प्रभा सूद का बहुत बहत आभार।









मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, May 20, 2015

अणुभारती में प्रकाशित ब्यँग्य






अणुभारती में प्रकाशित ब्यँग्य


मदन मोहन सक्सेना

परमाणु पुष्प में पूर्ब प्रकाशित मेरा ब्यंग्य

परमाणु पुष्प में पूर्ब प्रकाशित मेरा ब्यंग्य








मेरी बिदेश यात्रा .

मदन मोहन सक्सेना .

Tuesday, May 5, 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ८ ,मई २०१५ में


प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ८  ,मई  २०१५ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .



गजब दुनिया बनाई है, गजब हैं  लोग दुनिया के
मुलायम मलमली बिस्तर में अक्सर बह  नहीं सोते

यहाँ  हर रोज सपने  क्यों, दम अपना  तोड़ देते हैं 
नहीं है पास में बिस्तर ,बह  नींदें चैन की सोते

किसी के पास फुर्सत है,  फुर्सत ही रहा करती \
इच्छा है कुछ करने की,  पर मौके ही नहीं होते

जिसे मौका दिया हमने  , कुछ न कुछ करेगा बह  
किया कुछ भी नहीं ,किन्तु   सपने रोज बह  बोते

आज  रोता नहीं है कोई भी  किसी और  के लिए 
सब अपनी अपनी किस्मत को ले लेकर खूब रोते

मदन मोहन सक्सेना







Thursday, April 9, 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ७ ,अप्रैल २०१५ में







प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ७   ,अप्रैल  २०१५ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .


 ग़ज़ल (सिलसिला )

हर सुबह  रंगीन   अपनी  शाम  हर  मदहोश है
वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला

चार पल की जिंदगी में ,मिल गयी सदियों की दौलत
जब मिल गयी नजरें हमारी ,दिल से दिल अपना मिला

नाज अपनी जिंदगी पर ,क्यों न हो हमको भला
कई मुद्द्दतों के बाद फिर  अरमानों का पत्ता हिला

इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर
रफ्ता रफ्ता ढह गया, तन्हाई का अपना किला

वक़्त भी कुछ इस तरह से आज अपने साथ है
चाँद सूरज फूल में बस यार का चेहरा मिला

दर्द मिलने पर शिकायत ,क्यों भला करते मदन
जब दर्द को देखा तो  दिल में मुस्कराते ही मिला


ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

Monday, March 9, 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ७ ,मार्च २०१५ में

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ७  ,मार्च  २०१५ में


प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक ७  ,मार्च  २०१५ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .
 


ग़ज़ल (कौन सुनेगा अपनी बात )

किसको अपना दर्द बतायें कौन सुनेगा अपनी बात
सुनने बाले ब्याकुल हैं अब अपना राग सुनाने को

हिम्मत साथ नहीं देती है खुद के अंदर झाँक सके
सबने खूब बहाने  सोचे मंदिर मस्जिद जाने को

कैसी रीति बनायी मौला चादर पे चादर चढ़ती है
द्वार तुम्हारे खड़ा है बंदा , नंगा बदन जड़ाने को

दूध कहाँ से पायेंगें जो, पीने  को पानी न मिलता
भक्ति की ये कैसी शक्ति पत्थर चला नहाने को

जिसे देखिये मिलता है अब चेहरे पर मुस्कान लिए
मुश्किल से मिलती है बातें दिल से आज लगाने को

क्यों दिल में दर्द जगा देती है  तेरी यादों की खुशबु
गीत ग़ज़ल कबिता निकली है महफ़िल को महकाने  को



प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना