Wednesday, August 6, 2014

सुन्दर हिंदी प्यारी हिंदी में प्रकाशित ग़ज़ल













 




सुन्दर हिंदी प्यारी हिंदी में प्रकाशित ग़ज़ल :





दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है.

उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं

जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं

जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं



(आप के लिए श्री मदन मोहन सक्सेना जी की रचना "हालात कैसे आज बदले है")

मेरी रचनाएँ परमाणु पुष्प में





मेरी रचनाएँ परमाणु पुष्प में


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मदन मोहन सक्सेना





मेरी पोस्ट ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया )आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में



मेरी पोस्ट ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया )आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में


प्रिय   मित्रों मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी पोस्ट ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया )आपका ब्लॉग ए बी पी न्यूज़ में शामिल की गयी है।  आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएं।






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क्या खोया और क्या पाया

अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर
बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल

ख्बाबो और यादों की गली में उम्र गुजारी है
समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल

कहने को तो कह लेते हैं  अपनी बात सबसे हम
जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल

ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता
अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है
क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल


मदन मोहन सक्सेना

तत्सम पत्रिका में प्रकाशित मेरी कुछ क्षणिकाएँ















तत्सम पत्रिका में प्रकाशित मेरी कुछ क्षणिकाएँ .

एक :

संबिधान है 
न्यायालय है
मानब अधिकार आयोग है 
लोकतांत्रिक सरकार है 
साथ ही 
आधी से अधिक जनता 
अशिक्षित ,निर्धन और लाचार है .



दो:

कृषि प्रधान देश है 
भारत भी नाम है 
भूमि है ,कृषि है, कृषक हैं 
अनाज के गोदाम हैं 
साथ ही 
भुखमरी,  कुपोषण में भी बदनाम है .


तीन:

खेल है 
खेल संगठन हैं 
खेल मंत्री है 
खेल पुरस्कार हैं 
साथ ही 
खेलों के महाकुम्भ में 
पदकों की लालसा में 
सौ करोड़ का भारत भी देश है .




























मदन मोहन सक्सेना .


अणु भारती में पूर्ब प्रकाशित मेरी पाँच गज़लें :



अणु भारती में पूर्ब  प्रकाशित मेरी पाँच गज़लें :




मदन मोहन सक्सेना .

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ८, अक्टूबर २०१३ में

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ८, अक्टूबर २०१३ में 






 
प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ८, अक्टूबर २०१३ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .

आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहे
बह सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर है

खून से खेली है होली आज के इस दौर में
कह रहे सब आज ये नहीं मिल रहा अब नीर है

मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी
ये ब्यथा अपनी नहीं हर एक की ये पीर है

सुन चुके है बहुत किस्से वीरता पुरुषार्थ के
रोज फिर किसी द्रौपदी का खिंच रहा क्यों चीर है

इन्सान कि इंसानियत के गीत अब मत गाइए
हमको हमेशा स्वार्थ की मिलती रही तामीर है

आज के हालत में किस किस से हम बचकर चले
प्रश्न लगता है सरल पर ये बहुत गंभीर है

ब्याकुल हुआ है मदन अब आज के हालत से
आज अपनी लेखनी बनती न क्यों शमशीर है

 


मदन मोहन सक्सेना


Tuesday, August 5, 2014

मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ७ , सितम्बर २०१३ में


मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -२, अंक ७ , सितम्बर  २०१३ में



















क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में


एक जमी बख्शी थी कुदरत ने हमको यारो लेकिन
हमने सब कुछ बाट दिया है मेरे में और तेरे में


आज नजर आती मायूसी मानबता के चेहरे पर
अपराधी को शरण मिली है आज पुलिस के डेरे में


बीरो की क़ुरबानी का कुछ भी असर नहीं दीखता है
जिसे देखिये चला रहा है क्यों सारे तीर अँधेरे में


जीवन बदला भाषा बदली सब कुछ अपना बदल गया है
अनजानापन लगता है अब खुद के आज बसेरे में


क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है.
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में



मदन मोहन सक्सेना